Tuesday, 20 June 2023
सिकन्दर शाह लोदी के चरित्र तथा उसकी उपलब्धियों का मूल्यांकन करें
Ans. बहलोल लोदी के मरने पर उसका पुत्र निजाम खाँ सिकन्दर शाह के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा परन्तु अमीर और सरदार लोग उसको सुल्तान मानने से इन्कार किये जिसका एकमात्र कारण था कि उसकी माँ एक सोनार की बेटी थी। अतः उसका पुत्र एक साधारण व्यक्ति था। अन्त में उन सबों का यह संकोच टल गया और वे लोग निजाम खाँ को सुल्तान मान लिये। सिकन्दर शाह एक कट्टर मुसलमान था। वह हर तरह से योग्य और कुशल था। गद्दी पर बैठते ही उसको अपने सब विद्रोहियों से निपटना पड़ा। इस क्षेत्र में उसका निम्नलिखित कार्य प्रमुख है—
1. आलम खाँ से संघर्ष सिकन्दर शाह अपने चाचा आलम खाँ से संघर्ष करने के लिए बाध्य था क्योंकि वह स्वतंत्र होने के लिए प्रयत्न कर रहा था। जब सिकन्दर शाह उसको दबाने रापटी गया तो वह डर से भाग गया। सिकन्दर शाह आलम खाँ को ईसा खाँ का साथ छोड़ने का प्रलोभन देने में सफल हुआ। सिकन्दर शाह स्वयं ईसा खाँ से निपटने के लिए आगे बढ़ा और उसको हरा दिया। वहाँ के राजा गणेश ने सिकन्दर शाह की अधीनता स्वीकार कर ली। यहाँ पर सिकन्दर शाह को पटियाला की जागीर मिली।
2. बारबक शाह से संघर्ष बारबक शाह उसका अपना भाई था जो जौनपुर का शासक था। इसलिए सिकन्दर शाह अपने भाई से लड़ना नहीं चाहता था। वह उससे समझौता करना चाहता था। इसी समझौता के द्वारा वह अपने भाई बारबक शाह को अपनी अधीनता स्वीकार करना चाहता था परन्तु बारबक शाह को किसी के बहकावे में आकर सिकन्दर शाह से लड़ना पड़ा। दोनों की सेना में भिड़न्त हुई। बारबक शाह हार गया और बदायूँ भाग गया। अन्त में वह पकड़ा गया तथा सुल्तान के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। सिकन्दर शाह ने उसके साथ सौजन्यता का व्यवहार कर पुनः जौनपुर की गद्दी पर बैठा दिया। अबतक बारबक शाह की सारी शक्ति क्षीण हो गई थी क्योंकि सुल्तान ने उसकी जागीरों को अपने साथियों में बाँट दिया था। बारबक के मकान में उसने गुप्तचर भी रख दिया था। हुसेन शाह से संघर्ष जनपुर में एक भयंकर विद्रोह हो गया। इसको सन्दर ने शान्त कर बारबक को पुनः जीनपुर की गद्दी पर बैठाया। परन्तु इसी बीच सिकन्दर शाह को यह पता चला कि बारबक शाह अपने विद्रोहियों के साथ सांठ-गांठ कर रहा है। खासकर हुसेन शाह से गहरा गठबंधन कर लिया है। सिकन्दर शाह ने उसको पकड़वा लिया। इसके बाद सिकन्दर शाह जौनपुर से चुनार की ओर बढ़ा जहाँ पर हुसेन शाह के बहुत से सरदार और अमीर थे। उन सबों को उसने हराकर चुनार पर घेरा डाला। परन्तु वह घेरा डालने में सफल न हुआ।
3. बनारस से सिकन्दर शाह और बिहार से हुसेन शाह चला। दोनों की सेनाओं में युद्ध हुआ। अन्त में हुसेन शाह की हार हो गई। हुसेन शाह अपनी एक लाख सेना के साथ पटना भागा। जब इसकी सूचना सिकन्दर शाह को मिली तो वह उसका पीछा पटना तक किया। तब हुसन शाह लखनौती भाग गया। वहाँ पर छिपा रहकर उसने सारा जीवन बिता दिया। इस तरह से सारा देश सुल्तान के अधिकार में आ गया।
4. बंगाल से संधि : सुल्तान के साथ बंगाल ने एक संधि कर अपने राज्य को बचा पाया। इस संधि के द्वारा यह तय हुआ कि कोई भी पक्ष दूसरे के प्रदेश पर आक्रमण नहीं करेगा। बंगाल के शासक ने यह प्रण किया कि वह सिकन्दर शाह के शत्रुओं की कोई मदद नहीं करेगा।
5. सरदारों के साथ संघर्ष सिकन्दर शाह को सरदारों के साथ भी संघर्ष करना पड़ा। उसने आदेश दिया कि सरदारों के हिसाब-किताब का परीक्षण किया जाय। इस आदेश के विरोध में सरदार और अमीर लोगों ने सुल्तान से संघर्ष किये परन्तु इस दिशा में सुल्तान को ही सफलता मिली। सुल्तान ने इन सब विद्रोहियों का दमन कर दिया।
6. आगरा की स्थापना सिकन्दर शाह ने ही आगरा नगर को स्थापित किया। अपने दुश्मनों से रक्षा पाने के विचार से सिकन्दर शाह ने इस नगर की नींव सन् 1540 ई० में दी। शीघ्र ही एक सुन्दर नगर का निर्माण हो गया जो आगरा कहलाया। सुल्तान भी अपना निवास स्थान दिल्ली से हटाकर आगरा ले आया। इससे आगरा नगर की शोभा और भी बढ़ गयी।
7. सन् 1508 ई० में सुल्तान ने नरवाड़ पर आक्रमण किया। नरवाड़ उस समय मालवा के राज्य में मिला हुआ था जो ग्वालियर के अधीन था। सिकन्दर शाह नरवाड़ को हड़पना चाहता था। फलतः भयंकर युद्ध हुआ जिसमें सिकन्दर शाह की विजय हुई। सिकन्दर शाह ने वहाँ के दुर्ग में प्रवेश कर सभी हिन्दू मंदिरों को तोड़ कर उन स्थानों पर मस्जिदों के निर्माण का आदेश दे दिया।
8. चन्देरी : सिकन्दर शाह ने चन्देरी को भी अधिकृत करना चाहा। युद्ध हुआ, जिसमें चन्देरी का राजकुमार हार गया। अंत में उसने सिकन्दर शाह की अधीनता मान ली। एक तरह से चन्देरी राजकुमार के हाथ से निकल गया क्योंकि सुल्तान ने इसका प्रबंध अफगान अधिकारियों को दे दिया था।
9. उसका आंतरिक शासन : सिकन्दर शाह का आंतरिक शासन भी ठीक था। सरदारों और अमीरों के हिसाब-किताब की जाँच करायी गयी जिससे राजकोष में बहुत सा धन आ गया। फलतः देश की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो गयी। देश में गुप्तचरों का भी संगठन किया गया जिससे समय पर सुल्तान को हर बात की ख़बर होने लगी। सुल्तान ने कृषि कार्य को भी प्रोत्साहन दिया। उसने अन्य पर से महसूल को हटा दिया। सिचाई का उत्तम प्रबंध किया गया। बहुत सी नहरों का निर्माण कराया गया। किसानों को हर तरह की सुविधा दी गई। व्यापारियों और अन्य तरह के व्यवसाय करने वालों को हर तरह की सुविधा दी गई। उन लोगों की शांति और सुरक्षा की भी व्यवस्था की गई। सुल्तान ने प्रत्येक वर्ष गरीबों की सूभी तैयार करवाकर उन्हें छ: मास की रसद भी देने का प्रबंध करवाया। कैदियों को भी उसने कुछ दिनों के लिए मुक्त किया। सुल्तान स्वयं लोगों की फरियाद को सुना करता था। वह उचित न्याय देने में सफल रहा ||
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